जल संकट के मुहाने पर खड़ा विश्व।



अनीता वर्मा
वर्तमान में विश्व के समक्ष गहराता जल संकट एक ज्वलंत मुद्दा है।जल के बगैर जीवन की कल्पना ही असंभव है।हाल में संयुक्त राष्ट्र संघ ने पेयजल के भंडार में लगातार कमी को लेकर चेताया है।जिसके कारण 2030 तक लगभग 70 करोड़ लोग विस्थापित होगें और दो अरब लोग ऐसे पानी को पीने हेतु बाध्य होगें जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक है। रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में चालीस फीसदी आबादी के पास पर्याप्त पेयजल के स्त्रोत नहींं है।संयुक्त राष्ट्र के अनुसार जिन राज्यों में हिंसा और झड़पें हो रही है वहां सूखा और अकाल की समस्याएं भी है।जैसे यमन,सीरिया आदि।

विश्व की तेजी से बढ़ती जनसंख्या ने निश्चित ही जलसंसाधन पर दबाव बनाया है। वैसे तो विश्व के क्षेत्रफल का सत्तर फीसदी भाग जल से भरा है लेकिन इसका मात्र दो फीसदी ही मानव उपयोग लायक है।शेष नमकीन है।दो फीसदी जल में एक फीसदी जल हिम अवस्था में,इसमें भी 0.5 फीसदी जल नमी के रुप में भूमिगत जल में,शेष एक फीसदी जल मानव के उपयोग हेतु बचता है।जिससे विश्व की सत्तर फीसदी कृषि क्षेत्र की सिंचाई तथा अस्सी फीसदी जनसंख्या अपने दैनिक क्रियाकलाप और पेयजल हेतु निर्भर है। ,लेकिन आश्चर्य है कि यह जल भी प्रदूषण की मार से अछूता नहीं है।जिसके कारण मनुष्यों के साथ साथ पशु पक्षियों का भी अस्तित्व संकट में है क्योंकि दूषित जल के कारण स्वास्थ्य समस्याओं ने भयावह तस्वीर को सामने ला खड़ा किया है।यदि जल दूषित होगा तो खाद्य पदार्थ भी दूषित होगा।जैसे उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में दूषित जल और दूषित खाद्य पदार्थ के भयावह परिणाम दृष्टिगोचर हो रहे है।
ज्ञात हो कि एक सर्वे में सोनभद्र में औद्योगिक प्रदूषण के कारण भूजल में लेड,आर्सेनिक, मरकरी की मात्रा मानक से कई गुना पाया गया है जिसके कारण लोगों में कैंसर, कीडनी,लीवर,त्वचा इत्यादि संबंधी रोगों में वृद्धि हुआ है। 
भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, झारखंड, छत्तीसगढ़, असम आदि राज्यों में आर्सेनिक की मात्रा तय मानक से कई गुना है।स्थिति यह है कि उत्तर प्रदेश के कई जिलों के हैंडपंपो को एहतियात के तौर पर सील किए गए है।मथुरा के बैराज के कारण यमुना नदी का रूका पानी स्थानीय भूजल हेतु खतरनाक होता जा रहा है क्योंकि मथुरा के आसपास बोरिंग के दौरान कुछ स्थानों पर लाल रंग का पानी निकल रहा है जो चिंता का विषय है।

प्रश्न उठता है कि विश्व में जल संकट के कारण क्या है?


विश्व में जल संकट के कोई एक नहीं है बल्कि अनेकों कारण है।जैसे पहला विश्व की तेजी से बढ़ती जनसंख्या ।जैसा कि हम जानते है कि जल के बगैर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है।जल एक प्राकृतिक संसाधन है जिसका उपयोग पृथ्वी पर निवास करने वाले पशु पक्षियों और मनुष्यों द्वारा किया जाता है। ज्ञात हो कि केवल पेयजल हेतु ही नहीं बल्कि दैनिक गतिविधियों में भी जल का इस्तेमाल होता है। इसके अतिरिक्त वनस्पतियों हेतु भी जल की अनिवार्यता आवश्यक है।जिस अनुपात में जनसंख्या वृद्धि हो रही है उस अनुपात में जल की उपलब्धता नहीं है। यह सत्य है कि विश्व में जल की उपलब्धता वर्तमान में भी उतनी ही है जितनी 2000 वर्ष पूर्व थी। अंतर केवल इतना है कि वर्तमान जनसंख्या की तुलना में केवल 3% ही थी।जनसंख्या वृद्धि के फलस्वरूप औद्योगीकरण और नगरीकरण होने के कारण जल की आवश्यकता और बढ़ी है।जिसके फलस्वरूप जल की मांग के अनुसार पूर्ति करना एक चुनौती बन चुका है।इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, भूमिगत जल का अत्यधिक दोहन,वनस्पतियों का विनाश,लीकेज पाइप आदि जल संकट के कारण है।
भारत में जल संकट के कारणों में तीव्र गति से जनसंख्या वृद्धि तो है ही इसके अतिरिक्त भी कई कारण है जैसे बढ़ती जनसंख्या के हितों की पूर्ति हेतु भूजल के रिचार्ज होने की व्यवस्थाओं को विकास हेतु शनैः शनैः समाप्त किया गया है। जिसके कारण भूजल रिचार्ज नहीं हो पा रहा है।जैसे तालाबों को भरकर उसके ऊपर मकान,सॉपिंग माल इत्यादि का निर्माण किया गया है। हाल में बिहार में एम्स हेतु जमीन आवंटित किया है जहाँ 35 एकड़ की झील थी ।निश्चित ही लोगों के बेहतर स्वास्थ्य हेतु एम्स आवश्यक है,लेकिन जल के स्त्रोत को समाप्त करने की कीमत पर तो नहीं।
नदियों के संदर्भ में देखे तो बालू का अतिदोहन के फलस्वरूप भूमिगत जल का रिचार्ज होना असंभव है ।इसलिए जिन क्षेत्रों में बालू/मोरंग का अतिदोहन हो रहा है वहाँ का भूमिगत जलस्तर काफी नीचे चला गया है।जैसे झारखंड के गोड्डा जिले में कझिया नदी बालू के अतिदोहन का शिकार है जिसके कारण भूजल स्तर 250-300 फीट नीचे जा चुका है। इसी प्रकार अन्य नदियों के समीप वाले क्षेत्रों की भी यही स्थिति है।

विकास हेतु लाखों वृक्षों की अंधाधुंध कटाई से भी पर्यावरण संतुलन बिगड़ा है।जिसके कारण जल चक्र का संतुलन बिगड़ा है।ज्ञात हो कि वनस्पतियां भी जल के प्रदूषण को फिल्टर करती है तथा बाढ़ और तूफान हेतु अवरोधक का कार्य करती है।इसके अतिरिक्त पानी आपूर्ति को विनियमित करती है क्योंकि पेड़ पौधों की उपस्थिति से वर्षा जल सीधे जमीन पर प्रवाहित होने के बजाय वृक्षों के जड़ो के माध्यम से भूमिगत जल को भी रिचार्ज करता है।
पानी का कुप्रबंधन भी जल संकट के कारणों में से एक है। वर्षा के पानी का काफी हिस्सा यूं ही नदियों के रास्ते समुद्र में बहकर चला जाता है।इसे जल का कुप्रबंधन ही कहेंगे।भारत में तो 15% वर्षा जल का ही उपयोग होता है।बाकी व्यर्थ हो जाता है।
भू जल का अतिदोहन भी जल संकट का कारण है। विश्व में जितने भूमिगत जल का इस्तेमाल पूरी दुनिया करती है ।उसका 24% अकेला भारत करता है।यही कारण है कि 2000 से 2010 के मध्य भूमिगत जल में गिरावट 23% रही है।वर्तमान में और भी ज्यादा हो गई है। जल का उचित प्रबंध न होने के कारण भूमिगत जल का अवैध तरीके से दोहन हो रहा है।उदाहरण के लिए ,भारत में कई नगर निगम या नगरपालिका लोगों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराने में असफल है जिसके कारण शहरों में समर्सिबल के माध्यम से भूजल का दोहन हो रहा है।जिन शहरों का भूमिगत जल खारा है वहां बड़े बड़े आरो प्लांट के माध्यम से भूमिगत जल का दोहन हो रहा है।जिसके कारण भी भूमिगत जल का स्तर नीचे जा रहा है।ग्रामीण क्षेत्रों में भी हालत अच्छे नहीं है।इन क्षेत्रों में भी जल के अतिदोहन के कारण भूमिगत जल का स्तर काफी नीचे जा चुका है।भारत में 57%नलकूपों और कुओं के माध्यम से खेतों में सिंचाई होती है।जिसमें व्यापक स्तर पर भूमिगत जल का दोहन होता है।कृषि में वैज्ञानिक सिंचाई का इस्तेमाल न होने के कारण भारत में एक ओर कृषि कार्यों में पानी का इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा होता है जिसके कारण जमीन पर नमकीन परत बनती जाती है और भूमि ऊसर में परिवर्तित होती जा रही है जैसे पंजाब ,हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश की भूमि जिसके कारण मिट्टी अपनी अन्न पैदा करने की क्षमता खोती जा रही है और इस प्रकार इन क्षेत्रों में भी खाद्यन्न संकट की स्थिति पैदा हो रही है।तो दूसरी ओर भारत के मराठवाड़ा, विदर्भ और बुदेलखंड आदि इलाकें भयंकर सूखे का सामना कर रहे है।दोनों ही स्थितियों में भूमि अपनी उत्पादकता की क्षमता खो रही है।
पानी आधारित उद्योगों में अत्यधिक खपत - कई ऐसे उद्योग है जिसमें पानी की खपत होती है जैसे कागज उद्योग, चीनी उद्योग, विद्युत उद्योग, कृषि आदि।जिसमें विद्युत आधारभूत संरचना का हिस्सा है ऐसे मे जल संकट के कारण कई उद्योगों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा जिसके कारण कोई भी देश बेरोजगारी की ओर अग्रसर होगा।
उद्योगों से निकले दूषित रसायनों से नदियों आदि का पानी दूषित हुआ है जिसके फलस्वरूप भूजल भी दूषित हुआ है और यह भी जल संकट ही है।भले ही पानी की उपलब्धता हो ,लेकिन दूषित जल स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं को जन्म देती है और यह भयावह है।भारत के संदर्भ में देखें तो यहाँ की कई नदियाँ प्रदूषण की मार झेल रही है जैसे गंगा, यमुना, दामोदर, मूसी ,ओशिवारा आदि।अफ्रीका के संदर्भ में देखें तो स्वच्छ जल के मामले में स्थिति बहुत खराब है।विश्व में जितने लोग असुरक्षित पानी पीते है उनमें से आधे अफ्रीका में है।स्थिति यह है कि सहारा अफ्रीका में केवल चौबीस फीसदी लोगों के पास पीने हेतु सुरक्षित जल उपलब्ध है और मात्र 28% लोगों के पास स्वच्छता से संबंधित सुविधाएं है।
Photo source:google

ग्लोबल वार्मिंग के कारण भी जल संकट की विकराल समस्या खड़ी हुई है।औद्योगिककरण और नगरीकरण के कारण जिस प्रकार तेजी से पृथ्वी के तापमान में वृद्धि हुई है।उसके कारण सूखा,चक्रवात ,बाढ़ की बारंबारता में वृद्धि हुई है।ऑस्ट्रेलिया के संदर्भ में देखे तो दिसंबर से फरवरी के मध्य पड़ी भीषण गर्मी के कारण नदियों का जलस्तर काफी नीचे जा रहा है।स्थिति यह है कि जलस्त्रोत 1940 के पश्चात अपने न्यूनतम स्तर पर पहुंच गए है।जिसके कारण सिडनी में हालात बदतर है।इस पीड़ादायी स्थिति से निपटने हेतु न्यू साउथ वेल्स प्रशासन ने एक बार पुनः 2009 के पश्चात कुछ कड़े प्रतिबंध लागू किए है जैसे जल को खुला छोड़ने को अपराध की श्रेणी में डाला है और अपने बगीचे में स्प्रिंकल सिंचाई करने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है।दक्षिण अफ्रीका के केप टाउन के सूखे के हालत से तो भलीभांति परिचित है।जहाँ डे जीरो के तहत सभी नलों से पानी की आपूर्ति बंद कर दी गई।

जल संकट के कारण किसी भी देश में खाद्यान्न संकट जैसी समस्या उत्पन्न होगी।ग्रामीण क्षेत्र किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का आधार होती है।व्यापक स्तर पर खाद्यान्न उत्पादन ग्रामीण क्षेत्रों में होता है।ऐसे में जल संकट के कारण मनुष्यों और पशुओं के आधारभूत आवश्यकता पर ही प्रहार होगा। अकाल जैसी स्थिति का सामना करना होगा और जैवविविधता पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।इसके अलावा जल की कीमत में भारी इजाफा होगा और जल और अन्न आम लोगों की पहुंच से बाहर होगा।जिसके कारण बहुसंख्यक आबादी को विस्थापन जैसे भयंकर स्थिति का सामना करना पड़ेगा क्योंंकि जिन जगहों पर पानी के स्त्रोत होगें वहाँ के लिए लोगों का आपस में संघर्ष होगा क्योंकि जीवन हेतु जल की आवश्यकता अनिवार्य है।ऐसे में यह संघर्ष सामाजिक,राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं को भी जन्म देगा।शहरी क्षेत्रों के संदर्भ में देखें तो यहाँ भी विस्थापन जैसी समस्याओं का सामना करना होगा क्योंकि जल के बिना जीवन असंभव है।ऐसे में यह भी हो सकता है कि पूरा शहर ही विस्थापित हो जाए जिसके कारण निश्चित ही बेरोजगारी बढ़ेगी और आर्थिक विकास की रफ्तार काफी धीमी हो जाएगी।

भारत के चेन्नई शहर के संदर्भ में देखें तो हाल में जल संकट के कारण हिंसक झड़प भी हुई है जो भयावह भविष्य की ओर इशारा कर रहा है।पिछले वर्ष दक्षिण अफ्रीका का केप टाउन भी भयंकर सूखे की चपेट में था जिसके कारण वहाँ जल संकट की स्थिति उत्पन्न हुई थी और पानी की राशनिंग करनी पड़ी।


जंगलों के संदर्भ में देखें तो यहाँ भी स्थिति भयावह ही होगी। जंगलों की जमीन में नमी के अभाव में दावानल की घटनाओं में वृद्धि होगी और जंगल नष्ट होगें। जैसा कि हम जानते है कि पशु पक्षियों का निवास स्थान जंगल ही होता है और कई दुर्लभ प्रजाति की वनस्पतियां भी पाई जाती है। जल के अभाव में हमारे जीवन का आधार जैवविविधता भी समाप्त होगा।चाहे वह पशुओं पक्षियों या वनस्पतियों के संदर्भ में हो।हाल ही में मध्यप्रदेश के देवास में प्यास के कारण कई बंदरों की जानें चली गई।

क्या जल संकट विनाश की ओर नहीं ले जा रहा है?

जल के बिना पृथ्वी पर जीवन असंम्भव है।जिस प्रकार संपूर्ण विश्व ही जल संकट के मुहाने पर खड़ा है।उसका परिणाम भयावह होगा।भारत सहित एशिया,अफ्रीका, यूरोप, ऑस्ट्रेलिया और अमेरिकी महाद्वीप के देश जलसंकट से जूझ रहे है।

भारत की स्थिति भी भयावहता की ओर ले जा रही है। भारत का 70% जल प्रदूषित हो चुका है।नीति आयोग के अनुसार ,2020 तक 21 शहरों के भूजल समाप्त हो जाएंगे।नीति आयोग की यह रिपोर्ट एक भयावह भविष्य की ओर इंगित करती है । 

जल संकट हेतु समाधान क्या है?

नगरीकरण और औद्योगीकरण के कारण व्यापक स्तर पर जंगलों का सफाया किया गया है।आवश्यकता है कि वृक्षारोपण किया जाए जिसे जल चक्र संतुलन की स्थिति ठीक हो सके।ज्ञात हो कि जल एक नवीकरणीय संसाधन है। बावजूद सीमित है।इसके अतिरिक्त वर्षा जल का बेहतर प्रबंधन होना चाहिए ताकि वर्षा जल को यू ही व्यर्थ में बहने से रोका जा सके।इसके अलावा यह भी आवश्यक है कि जो जल उपलब्ध है उसे बर्बाद न किया जाए।भारत के कई राज्यों में तालाबों और जलाशयों को पाट कर मकान,मॉल आदि का निर्माण किया है।आवश्यकता है कि तालाबों ,जलाशयों को अतिक्रमणता से बचाया जाए न कि उस को पाट कर निर्माण किया जाए।जैसे पटना का एम्स। और आवश्यकता नुसार भूमिगत जल को रिचार्ज होने हेतु तालाबों और जलाशयों का निर्माण कर उसे प्रदूषित होने से बचाया जाए और जो झीले और तालाब अस्तित्व में है उसे प्रदूषण मुक्त किया जाए ।जैसे हैदराबाद की हुसैन झील आदि।

नदियों के संदर्भ में देखें तो नदियों के जल को प्रदूषण मुक्त करने की आवश्यकता है क्योंकि एक तरफ जल स्त्रोत सिकुड़ रहे है तो दूसरी ओर तो दूसरी ओर प्रदूषण फैलाने वाली ईकाइयों में वृद्धि हो रही है।जिसके कारण नदियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है ।जैसे मुंबई की ओशिवारा नदी,गंगा, यमुना, दामोदर आदि भारत की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक है। दूसरा, नदियों से बालू के अत्यधिक दोहन पर रोक लगाने की आवश्यकता है तीसरा नदियों में प्रदूषण की रोक थाम हेतु प्रभावकारी सीवेज शोधन संयंत्रों की आवश्यकता है।चौथा भूजल को भी औद्योगिक प्रदूषण से निजात दिलाने की आवश्यकता है।

कृषि के संदर्भ में देखें तो वैज्ञानिक तरीके से सिंचाई पद्धति को अपनाने की आवश्यकता है।इजरायल कम वर्षा वाला क्षेत्र होते हुए भी बेहतर जल प्रबंधन तकनीक के कारण जल के बूंद बूंद का उपयोग बेहतरीन तरीके से करता है।आवश्यकता है कि भारत में भी कृषि हेतु ऐसी तकनीक का इस्तेमाल किया जाए।दूसरा जिन इलाकों में पानी की कमी है उन्हें चिह्नित कर ,कम पानी वाले खपत की कृषि को बढ़ावा दिए जाने की आवश्यकता है।

जनसंख्या को नियंत्रित करना -विश्व की बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रित करना आवश्यक है क्योंकि पृथ्वी पर जल संसाधन सीमित है। यह सत्य है कि जल एक नवीकरणीय प्राकृतिक संसाधन है बावजूद यह सीमित है। ऐसे में विश्व की तेजी से बढ़ती जनसंख्या को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध होना मुश्किल होगा।वर्तमान में आवश्यक है कि पानी को लेकर कोई ठोस रणनीति बनाई जाए।

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि जल संकट एक भयावह त्रासदी है।आवश्यकता है इस समस्या के समाधान हेतु गंभीर और सकारात्मक प्रयास करना ताकि पृथ्वी पर जीवों के अस्तित्वों की रक्षा की जाए और जीवन के आधार जैवविविधता को बनाए रखा जा सके और पृथ्वी पर जल युद्ध होने से रोका जा सके क्योंकि जल युद्ध निश्चित ही सामाजिक , राजनीतिक,आर्थिक आदि समस्याओं को जन्म देगा जिसके परिणाम जिसे हम आधुनिक भाषा में विकास कहते है ,विनाश में परिवर्तित होगा क्योंकि जिस प्रकार का विकास हो रहा है वह सतत विकास की धारणा के विपरीत है जिसका परिणाम भयावह होगा।

Post a Comment

MKRdezign

Contact Form

Name

Email *

Message *

Powered by Blogger.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget