कहीं विकास के नाम पर जानलेवा प्रदुषण की परत चढ़ न जाए


अब्दुल रशीद
पूंजीवाद का इतिहास मनुष्य के इतिहास जितना ही पुराना है,और पूंजीवाद ने ही सामंतशाही और वाणिज्यवाद के बीज बोए।पूंजीवाद की छाया जहां-जहां भी पड़ी वहां की संस्कृति अपने वजूद को खोती चली गई। आपकी जमीन आपके गांवों में रचे-बसे संसाधन को आपसे छीनकर,आपको स्वामी से आश्रित बनाने के साथ-साथ अपने बाजारवाद का उपभोक्ता बना देता है।आपके ही चीज़ों को आपको बेचकर पूंजीवाद अपना वजूद बनाता है और आपकी पहचान तक गुम हो जाती है।

फैसला राष्ट्रहित में है, लेकिन सवाल करना देशद्रोह क्यों?

अब बात दुनिया का स्वर्ग कहे जाने वाले कश्मीर की।इस बात से शायद सभी सहमत होंगें की अनुच्छेद 370 कश्मीर से अलगाववाद और आतंकवाद मिटाने के लिए हटाया गया है,न की कश्मीरियत को खत्म करने के लिए। 

यक़ीनन कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 A हटाने का फैसला राष्ट्रहित में है, इसमें कोई दो राय नहीं है।लेकिन यह भी इनकार नही किया जा सकता की,इस देश के हर नागरिक को सरकार की अच्छाई और बुराई जानने और उससे संबंधित सवालों को उठाने का अधिकार देश का संविधान देता है।

केंद्र की बीजेपी सरकार का जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना कितना सही रहा और कितना गलत,यह भविष्य के गर्भ में छिपा है,लेकिन,अगर इस देश कोई नागरिक सरकार के किसी फैसले से पर सवाल पूछती है, तो इसका मतलब यह नहीं के वह देशद्रोही है।

तब कश्मीर तो होगा लेकिन कश्मीरियत नहीं !

हम आपको बताया और दिखाया जा रहा है कि अलगाववादी रो रहे हैं और आतंकवाद की तो बस अब कमर ही टूटने वाली है लेकिन यह आधा सच है,जो नहीं बतया या दिखाया जा रहा है वह यह कि कल को कश्मीर में भी पूंजीवाद पहुंचकर अमरबेल की तरह पैर पसारेगा,और वहां भी मध्यप्रदेश के सिंगरौली जिले की तरह जिंदगी लीलने वाली प्रदुषण की परत चढ़ सकती है।हां सोशल मिडिया पर मुठ्ठी भर शब्दवीर जो बात कर रहें है कश्मीर में जमीन खरीदने की,दरअसल ये वही लोग हैं जो अपने गांव की जमीन पूंजीवाद के हांथो विकास के नाम पर गंवा कर अब नौकरी के लिए चक्कर काट रहें हैं,या पूंजीवाद के यहां अपना सब कुछ गंवा कर स्वामी से श्रमिक बन काम कर रहें हैं।

कहीं ऐसा न हो की छोटे-छोटे कश्मीरी ढाबों की जगह बड़े-बड़े होटल खुलने लगे फिर वही कश्मीरी, वेटर और नौकर बनकर उन होटलों में कश्मीरियत परोसने को बाध्य हो जाए,या बड़े-बड़े कारखाने खुलने लगे और प्रदूषण युक्त पर्यावरण में घुट-घुट कर जीने को विवश होना पड़े।शांत हिमालय के झील में कल-कल करते पतवारों की जगह कोई स्टीमर बोट की फर्राटे की आवाज़ ना ले ले। 

बेशक जश्न मनाया जाय,लेकिन इस बात का भी ध्यान रखा जाए की,धरती के स्वर्ग को स्वर्ग बना रहे।विकास के नाम सिंगरौली या सोनभद्र न बन जाए, हालांकि यह आस टूटेगी यकीनन। एक कड़वा सच यह भी है की सिंगरौली-सोनभद्र उर्जांचल के नाम से मशहूर इसलिए है कि यहां होने पैदा वाले बिजली से नामचीन शहरों के अंधेरे को मिटा कर घरों में उजाला भरता है, लेकिन सब कुछ गंवा चुके यहां के मूल निवासियों के जीवन में अंधेरा ही अंधेरा है और प्रदुषण से  तिलतिल कर मरने को मजबूर हैं,और सुध लेने वाला कोई नहीं।


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