दो जिले के लद्दाख को बिना विधानसभा का प्रदेश बनाए जाने की कहानी क्या है ?


मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले संवैधानिक अनुच्छेद 370 को हटाने का फ़ैसला किया,जिसके बाद प्रदेश के राज्यपाल की सिफ़ारिश पर राष्ट्रपति के आदेश से अब अनुच्छेद 370 को हटा लिया गया है। अमित शाह ने जम्मू-कश्मीर के संबंध में एक पुनर्गठन विधेयक भी सदन के सामने रखा जिसमें जम्मू-कश्मीर से राज्य का दर्जा वापस लेकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांटने का प्रस्ताव है। प्रस्ताव पारित होने के बाद जम्मू-कश्मीर और लद्दाख दो केंद्र शासित प्रदेश बन जाएगा। लेकिन लद्दाख चंडीगढ़ की तरह बिना विधानसभा का केंद्र शासित प्रदेश होगा। आइए आपको बताते है,दो जिले के लद्दाख को बिना विधानसभा का प्रदेश आखिरकार क्यों बनाया जा रहा है?



कब से और क्यों यह मांग उठ रही है 

दरअसल, लद्दाख खुद जम्मू कश्मीर से अलग होना चाहता है। यह मांग वो 70 सालों से करता आ रहा है। इसी मांग को ध्यान में रखते हुए लद्दाख को कश्मीर से अलग करके एक अलग केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया है।

आज़ादी के बाद से ही कश्मीर में राज करने वाली पार्टियों से बौद्ध धर्म के लोग नराज़ रहे हैं। उनका मानना है कि कश्मीर घाटी के कारण उनकी शांति में भी खलल पड़ता है। इसी वजह से आमतौर पर शंति प्रिय माने जाने वाले बौद्ध धर्म के लोगों ने कई बार पत्थरबाजी भी की है। इतना ही नहीं पूरे लद्दाख में ‘फ्री लद्दाख फ्रॉम कश्मीर’ के पोस्टर भी लगाए जाते रहे हैं।
लद्दाख की कुल आबादी 2,36,539 है। इसमें 48.87 % बौद्ध हैं और वहीं मुस्लिम आबादी 47% है। लद्दाखी, खासकर बौद्ध आबादी कश्मीर से लद्दाख को अलग करने की मांग करते रहें हैं।
लद्दाख बौद्ध संघ का मानना है कि कश्मीर से जुड़ा होने की वजह से नौकरियों में भी पक्षपात होता है। जैसे राज्य सरकार के तीन लाख कर्मचारियों में कुल 5900 बौद्ध हैं वहीं राज्य सचिवालय में केवल दो लोग लद्दाख से हैं। पढ़ाई के मामले में भी वे लगातार पक्षपात का आरोप लगाते रहते हैं।ऐसे में अगर लद्दाख को अलग राज्य का दर्जा मिल जाए तो ये वहां के निवासियों और खासकर बौद्ध आबादी के लिए यह महत्वपूर्ण होगा।

Labels:
Reactions:

टिप्पणी पोस्ट करें

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget