झारखंड : "एक कौर भात" और भाजपा की मात


अब्दुल रशीद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 9,अमित शाह की 11 और रघुबर दास की 51 सभाओं और चुनाव से पहले ‘अबकी बार 65 पार’ का नारा देने वाली भाजपा, इस बार केवल 25 सीटों पर ही सिमट गई। इस हार के पीछे कई कारण हैं लेकिन, सबसे मुख्य कारण पांच साल मुख्यमंत्री रहने के बाद अपनी सीट न बचा पाने वाले रघुबर दास की छवि बताई जा रही है।

भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर भले ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्माई चेहरे पर वोट मिलता है,लेकिन राज्यों में ऐसा नहीं है,चाहे महाराष्ट्र हो, मध्य प्रदेश या फिर झारखंड ही क्यों न हो, हर राज्य में पार्टी के अंदर ही विरोधी और बागी नेता बनकर कोई न कोई बाहर आ जाता है। झारखंड में सरयू राय इसके उदाहरण हैं। 

केंद्र में दूसरी बार सत्ता संभालने के बाद से भाजपा विधानसभा चुनाव में अपने सहयोगियों के असहमतियों को दूर करने की कोशिश नहीं करते हैं ऐसा भाजपा के सहयोगियों को अब लगने लगा है। महाराष्ट्र चुनाव का परिणाम इसका सबसे बड़ा उदाहरण हैं। लजेपी नेतृत्व ने भी रघुरदास के काम के तरीके पर सवाल उठाते हुए झारखंड में अलग चुनाव लड़ा। वहीं दूसरी ओर विपक्षी दल हर तरह से सामंजस्य बनाने की कोशिश करते हुए नज़र आते हैं। झारखंड में भी ऐसा ही कुछ देखने को मिला है। कांग्रेस ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) को ज़्यादा सीटें दीं और आपसी सहमति बनाने में सफलता हासिल की।

झारखंड में केन्द्रीय स्तर पर चल रहे कार्यक्रम को विधानसभा चुनावों में चुनावी मुद्दा बनाना और वोट के पोलराइजेशन के लिए दिए जाने वाले बयानों का लाभ भाजपा को नहीं मिल पाया। झारखंड में JMM ने चुनाव प्रचार के दौरान भुखमरी और रोजगार को मुख्य हथियार बनाया। JMM अपनी हर सभा में जनता को भाजपा सरकार में हुई भूख से मौत की पीड़ा पर जिम्मेदारों की लापरवाही का एहसास दिलाती रही। ज्ञात हो की झारखंड में भुखमरी के कारण पिछले 5 सालों में 22 मौतें हुई हैं जिनकी जिम्मेदारी किसी ने नहीं ली। भुखमरी को लेकर बीजेपी सरकार कितनी लापरवाह दिखी थी, इसका अंदाज़ा इस बात से ही लगया जा सकता है,कि रघुबर दास की सरकार से जब इस बारे में पूछा गया तो, उनकी सरकार ने साफ इनकार कर दिया। उनके अनुसार पिछले पांच सालों में भुखमरी से किसी की मौत ही नहीं हुई थी। ‘एक कौर भात’ न होने से कोयला देवी की मौत हुई थी, जिसे झारखंड तो क्या पूरा देश नहीं भूल सकता है। जब मानवीय संवेदना को झ्ंकझोर देने वाली ऐसी दर्दनांक मौत का भी रिकॉर्ड झारखंड के भाजपा सरकार के पास नहीं था तो,जो रिजल्ट आया है यह उसी की देन है। 

भाजपा को झारखंड की 28 आदिवासी सीटों में से सिर्फ 2 पर ही जीत मिली। यह भाजपा के हार का सबसे बड़ा कारण माना जा सकता है। रघुबर दास के बर्ताव से जनता बहुत नाराज थी।ऐसा इसलिए भी कहना सही है क्योंकि कई बार इस बारे में सरयू राय ने पार्टी की मीटिंग में इस बात का जिक्र करना चाहा लेकिन,उनकी बातों को नज़रअंदाज कर दिया गया। अमित शाह और पीएम नरेन्द्र मोदी हर बार रघुबर दास की पीठ थपथपाते रहे। इससे विपक्ष में खड़े हो रहे लोगों की रघुबर दास के प्रति नाराजगी और बढ़ती गई,भाजपा को हार का स्वाद चखना पड़ा। 
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