जलेबी का मज़हब क्या है?


उर्जांचल टाइगर "विशेष"

व्हाट्सऐप यूनिवर्सिटी के ग्रैजुएट्स ने सारे चचाओं के नाम पर आफत मचा रखी है। एक चाचा नेहरू हैं, जिनके बारे में ना जाने कितने उल्टे-सीधे किस्से फैला रखी है। दूसरे चचा ग़ालिब जिनके नाम पर कितने ही अनाप-शनाप शेर का शोर है, जिसका उनसे कोई वास्ता ही नहीं है। 

बहरहाल, आज जलेबी का मज़हब क्या है? चचा ग़ालिब के सच्चे किस्से पढिए, जो आज मज़हबों के नाम पर देश में बने तनातनी के माहौल के बीच बेहद प्रासंगिक सा लगता है।

चचा गालिब के किस्से से पहले एक इंट्रेस्टिंग बात आपको जानकारी के लिए बताना चाहूंगा। ग़ालिब के अब्बा जो थे न, उनके भी वालिद समरकंद, जो कि अब उज़केबिस्तान में है,वहां से आए थे। 
अब जरा सोंचिए देश के ऐसे NRC-नुमा माहौल में अगर ग़ालिब होते, तो वे हिंदुस्तानी होते या अदृश्य डिटेंशन सेंटर के दरो-दीवार से सब्ज़ा उगते देख रहे होते, खैर यह सब सोशल मीडिया की ख़याली पुलाव है,जो न जाने कौन बनाता है,कौन खाता है,लेकिन ज़ायका इंसानियत का ही बिगड़ता है।
जलेबी का मज़हब क्या है?

किस्सा कुछ यूं है कि एक बार दिवाली की शाम मिर्ज़ा दिल्ली की सड़कों पर चहलकदमी करते अपनी हवेली को जा रहे थे। रास्ते में उनकी मुलाकात अपने एक जानने वाले से हुई, जो कि एक हिन्दू भाई था। दिवाली की बधाइयां एक दूसरे को देने के बाद उस आदमी ने ग़ालिब को इत्तिला दी कि दिवाली की मिठाई उनकी हवेली पर पहुंचा दी गई है। उसके बाद वह अपने रास्ते चले गएं।

इतने में चौक पर बैठे एक मौलाना, जो यह सब देख-सुन रहे थे, उन्होंने ग़ालिब से पूछा, भई मिर्ज़ा, तुम दिवाली की मिठाई खाओगे?
ग़ालिब ने कहा,
हां। बर्फी है, ज़रूर खाएंगे।
तिसपर मौलाना ने त्यौरियां चढ़ाकर कहा,लेकिन वो तो हिन्दू है!
जवाब में ग़ालिब तपाक से बोल उठे,
अच्छा, बर्फी हिन्दू है? तो फिर जलेबी का मज़हब क्या है?
यह जवाब सुनकर मौलाना को कुछ बोलते ना बना और चचाजान मुस्कुराते हुए हवेली की ओर चल पड़ें, जहां उनका इंतज़ार बर्फी कर रही थी।

मौजूदा वक्त में धर्म के नाम पर मचे शोर के बीच, चचा गालिब का एक शेर है, जो धर्म की दीवारों को तोड़कर इस मिट्टी की तासीर पेश करता है,
ईमां मुझे रोके है जो खींचे है मुझे कुफ़्र
काबा मिरे पीछे है कलीसा मिरे आगे
मेरा ईमान मुझे विचलित होने से रोकता है। कभी कभी कुफ्र भी मुझे आकर्षित करता है। कभी लगता है, काबा मेरे पीछे हैं और कलीसा गिरजाघर मेरे सामने है। 

इस देश के मिट्टी की यही तासीर है जिसने गंगा जमुनी तहज़ीब को जन्म दिया,इसी तासीर की बदौलत हम वैश्विक मंचों पर वसुधैव कुटुम्बकम कहने का दावा करते हैं।
ढोंग के बजाय,मिलकर इस दावे को कायम रखने की ईमानदार कोशिश किया जाए।  
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