क्या है,अर्थव्यवस्था की धीमी होती रफ्तार का कारण?



राहुल लाल,
सदस्य, भारत-यूरोपीय यूनियन सांस्कृतिक परिषद।
भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी हो गई है।अर्थव्यवस्था का हर क्षेत्र मांग की कमी से प्रभावित है।चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर फिसलते हुए 4.5 फीसदी पर पहुँच चुकी है,जो पिछले 6 वर्षों से भी अधिक समय का सबसे निचला स्तर है।इस तिमाही की यह विकास दर पिछले 26 तिमाहियों में सबसे न्यूनतम स्तर पर है।वर्ष 2016-17 के प्रथम तिमाही में जीडीपी विकास दर 9.2% थी,जो 2016-17 के संपूर्ण वार्षिकी में गिरकर 8.2% हो गई।जीडीपी विकास दर 2017-18 में घटकर 7.2% रह गई और वर्ष 2018-19 में जीडीपी विकास दर 6.8% रह गई।इसके साथ ही इस वर्ष जनवरी से मार्च तिमाही में जीडीपी विकास दर केवल 5.8% रह गई थी। 2019-20 की पहली तिमाही में अर्थात अप्रैल से जून में जीडीपी वृद्धि दर 5% रह गई।इस तरह केवल इसी कैलैंडर वर्ष में जीडीपी 5.8 फीसदी से गिरकर अब 4.5 फीसदी पर पहुँच चुकी है।वहीं 2016-17 के प्रथम तिमाही (9.2%) से 2019-20 के द्वितीय तिमाही तक (4.5%) में जीडीपी वृद्धि दर में 4.7% की गिरावट आ चुकी है।जीडीपी की विकास दर घटने से लोगों की आमदनी,खपत और निवेश पर सबसे ज्यादा असर पड़ा है।इससे नौकरियों पर भी अत्यधिक प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।वर्ष 2019-20 के दूसरी तिमाही में नॉमिनल वृद्धि दर 6.1 फीसदी पर रही,जो पिछले एक दशक में सबसे कम है।सरकारी राजस्व एवं मध्य वर्ग के वेतन में वृद्धि काफी हद तक नॉमिनल जीडीपी वृद्धि दर पर ही निर्भर करता है।नॉमिनल वृद्धि दर 6.1 प्रतिशत से कम रहने पर अब उस स्तर से भी नीचे आ गई है, जिस पर सरकार उधारी लेती है।अपने घाटे की भरपाई के लिए सरकार फिलहाल 6.5 फीसदी के नॉमिनल जीडीपी दर पर उधारी ले रही है।विशेषज्ञों का मानना है कि अर्थव्यवस्था के लिए यह तगड़ा आघात है।इसका मतलब होगा कि सरकार पर ऋण बोझ आगे और बढ़ेगा।इससे भी अहम है कि अर्थव्यवस्था के उधारी दर में सुस्त रफ्तार से बढ़ने पर उन प्रोत्साहनों में भी कमी आएगी,जिनके आधार पर निवेशक फैसले लेते हैं।

अर्थव्यवस्था के धीमी रफ्तार का कारण घरेलू न कि वैश्विक

सरकार बार-बार कह रही है कि विकास की धीमी रफ्तार का कारण वैश्विक मंदी है।सरकार इसके लिए चीन-अमेरिका ट्रेड वार को भी जिम्मेदार मानती है।हालांकि,यह दलील काफी सतही है।मसलन,ट्रेड वार में उलझे चीन की इसी तिमाही(जुलाई-सितंबर) में वृद्धि दर 6 प्रतिशत है।यह कहना मुश्किल है कि चीन की तुलना में भारत पर ट्रेड वार का असर ज्यादा पड़ जा रहा है।इसी तरह पड़ोसी देश बांग्लादेश में भी जीडीपी विकास दर 7 प्रतिशत बना हुआ है।वियतनाम ने भी पिछले 10 वर्षों का उच्चतर विकास दर इसी अवधि में प्राप्त किया है।इससे हमलोग समझ सकते हैं कि भारतीय अर्थव्यवस्था के धीमी रफ्तार के कारण वाह्य न होकर आंतरिक ही हैं।

अर्थव्यवस्था की धीमी रफ्तार 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के मार्ग में भी बाधक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए शपथ ग्रहण के कुछ दिन बाद कहा था कि हम देश की अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर कर देंगे।लेकिन जिस तरह से देश में आर्थिक वृद्धि दर में गिरावट जारी है,उससे देश के लिए इस संकल्प को पूरा करने का लक्ष्य भी हाथ से फिसलते जा रहा है।आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार 2024-25 तक 5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी के लिए 12% का विकास दर अपेक्षित है।स्वयं सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार 5 ट्रिलियन डॉलर इकॉनोमी को पाने के लिऐ 8 % विकास दर तो न्यूनतम आवश्यक है।अगर जीडीपी विकास दर 4.5 फीसदी रही,तो भारतीय अर्थव्यवस्था और भी धीमी गति से विकसित होगी।4.5 प्रतिशत के विकास दर से इस लक्ष्य को पाने में कम से कम 14 वर्ष लगेंगे।दूसरे शब्दों में इस विकास दर से 5 ट्रियिलन डॉलर का लक्ष्य 2033-34 में ही संभव है।

खपत में गिरावट

खपत दर घटने से लोगों आमदनी पर बुरा असर पड़ रहा है।देश में बाजार की सबसे बड़ी रिसर्चर कंपनी "नील्सन" की रिपोर्ट कहती है कि तेजी से खपत वाले सामान यानी फास्ट मूविंग कंजपशन गुड्स अर्थात एफएमसीजी की बिक्री की विकास दर भी लगातार गिरती जा रही है।अब लोग 5 रूपये के बिस्किट खरीदने से पहले भी सोच रहे हैं।गिरती अर्थव्यवस्था के लिए खपत दर में कमी को वैश्विक ब्रोकेज कंपनी "गोल्डमैन सैश" ने भी रेखांकित किया है।गोल्डमैन सैश का कहना है कि देश के समक्ष खपत में गिरावट का कारण एनबीएफसी संकट को नहीं ठहराया जा सकता है,क्योंकि आईएलएंडएफएस के भुगतान संकट से पहले खपत में गिरावट को देखा जा सकता है।एनबीएफसी में संकट सितंबर 2018 में शुरु हुआ,लेकिन खपत में गिरावट जनवरी 2018 से ही जाती है।

लगातार दूसरे माह कोर सेक्टर में गिरावट

आठ कोर सेक्टर में अक्टूबर माह में 5.8 फीसदी गिरावट देखने को मिली।सितंबर माह में भी कोर सेक्टर में 5.2% फीसदी गिरावट आई थी।जीडीपी के इसी तिमाही में वृद्धि दर 4.5% तक लुड़काने में कोर सेक्टर की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।कोर सेक्टर इंडेक्स के अनुसार औद्योगिक उत्पादन घटने से बिजली की मांग में 12.4% तक की कमी आई है।पिछले माह यह खपत सितंबर के -3 फीसदी के मुकाबले इस बार -12.4 फीसदी हो गई है।सरकार के आँकड़ों के अनुसार सबसे तगड़ा झटका कोयला क्षेत्र को लगा है,जिसमें उत्पादन में 17.6 फीसदी की कमी दर्ज की गई है।वहीं कच्चे तेल के उत्पादन में 5.1% और प्राकृतिक गैस में 5.7 फीसदी की कमी आई है।वहीं सीमेंट के उत्पादन में 7.7 फीसदी और ईस्पात में 1.6% की कमी आई है।कोर सेक्टर में मुख्यतः आठ उद्योग शामिल होती हैं।यह हैं- कोयला,कच्चा तेल,प्राकृतिक गैस,स्टील,सीमेंट,बिजली,फर्टिलाइजर और रिफाइनरी उत्पाद।आईआईपी की गणना में इनका योगदान करीब 40.27% रहता है।

निर्यात में भी गिरावट

देश के निर्यात में लगातार तीसरे माह गिरावट आई है।सितंबर के निर्यात में 6.57 फीसदी की गिरावट आई है,तो वहीं अक्टूबर में 1.11 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई है।भारतीय अर्थव्यवस्था इस समय घरेलू मांग की कमी की समस्या से जूझ रही है,ऐसे में उद्योगपति अपना सामान निर्यात करते हैं और विदेशों में बाजार तलाशतें हैं।लेकिन भारतीय निर्यात की रफ्तार सुस्त पड़ चुकी है।निर्यात जीडीपी के 4 प्रमुख घटकों में से एक है।इंजीनियरिंग वस्तुओं के निर्यात में गिरावट काफी परेशान करने वाला है।एनडीए सरकार के प्रथम कार्यकाल में 2014 से 2019 के दौरान कुल औसत निर्यात वृद्धि दर 4 फीसदी रहा।हम लोग 2014-15 से पहले बात करें,तो निर्यात बेहतर था।वर्ष 2013-14 में निर्यात की वार्षिक वृद्धि दर 17% थी,जो 2014-15 और 2015-16 में घटकर क्रमशः -0.5% और -9% हो गई।अभी भी निर्यात दर लगातार ऋणात्मक बना हुआ है।वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने भी कहा है कि 5 ट्रिलियन डॉलर के अर्थव्यवस्था के लिए निर्यात दर 19 से 20% तक आवश्यक है।ऐसे में निर्यात वृद्धि के लिए विशिष्ट रणनीति बनाने की आवश्यकता है।उदाहरण के लिए चीन में अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ बढ़ने से एक रिक्तता पैदा हुई है,ऐसे में भारत लगभग 57 प्रकार के उत्पादों का निर्यात चीन को आसानी से कर सकता है।हम लोग देख सकते हैं कि किस तरह ट्रेड वार के संकट को वियतनाम और बांग्लादेश ने अपने लिए अवसर में बदला है।

मैन्युफैक्चरिंग(विनिर्माण) में गिरावट---

पिछले 2 साल में पहली बार मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में गिरावट दर्ज की गई है।चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र में 1 % की गिरावट आई है,जबकि इसकी पहली तिमाही में 0.6% की वृद्धि दर्ज की गई है।इसके पहले वित्त वर्ष की समान तिमाही में विनिर्माण क्षेत्र की वृद्धि दर 6.9% थी।वित्त वर्ष की पहली छमाही में विनिर्माण क्षेत्र के उत्पादन में 0.2% की गिरावट आई है।मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में अत्यंत कमजोर प्रदर्शन का कारण मांग में कमी है।उपभोक्ता उत्पादों के कमजोर मांग के कारण मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र सिकुड़ गया है,क्योंकि क्षमता ज्यादा है और उसकी तुलना में मांग काफी कम है।मैन्युफैक्चरिंग क्षेत्र में गिरावट अर्थव्यवस्था के लिए भयावह है।मैन्युफैक्चरिंग के भीतर 23 उपक्षेत्रों में सितंबर माह में सलाना आधार पर 17 में गिरावट आई है,जो पिछले माह के 15 की तुलना में ज्यादा है।

राजकोषीय घाटा बजट लक्ष्य के पार

केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा अप्रैल- अक्टूबर के दौरान 7.2 लाख करोड़ रूपये पर पहुँच गया,जो 7.01 लाख करोड़ रूपये के 2019-20 के बजट लक्ष्य से अधिक है।जुलाई- सितंबर के दौरान जीडीपी के आँकड़ों से पता चलता है कि 2019-20 की पहली छमाही में सामान्य जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर राजकोषीय घाटा 6.6 फीसदी रही,जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 5 जुलाई के अपने पहले बजट भाषण में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य 3.3% निर्धारित किया था।

अब तक सरकार अर्थव्यवस्था का सबसे तेज बढ़ता हिस्सा रही है,लेकिन राजकोषीय घाटे का पूरे वर्ष का लक्ष्य 7 माह में ही पार हो जाने के बाद यह जारी नहीं रहने वाला।इस तिमाही में जीडीपी विकास दर 4.5% इसलिए रही,क्योंकि सरकारी खर्च 15.6% बढ़ा है।ऐसे में अगर हम सरकारी खर्च को अलग रखें और तब पूरी अर्थव्यवस्था को देखेंगे, तो हम पाएँगें कि स्थिति और भी बुरी है।इस खर्च से अलग जो भारतीय अर्थव्यवस्था है,उसकी विकास दर गिरकर तीन प्रतिशत हो गई है।वर्तमान विकास दर में निजी क्षेत्र की भागीदारी नहीं के बराबर हो गई है।

कृषि विकास दर की चुनौती

वित्त वर्ष 2019-20 की दूसरी तिमाही में भारत की कृषि विकास दर 2.1% रही।यह पहली तिमाही के 2.0 प्रतिशत की तुलना में मामूली अधिक है।पिछले 5 वर्षों में औसत कृषि विकास दर 2.7% रहा।प्रधानमंत्री का महत्वाकांक्षी लक्ष्य है कि वर्ष 2022 तक किसानों की आय दुगुनी की जाएं।इसके लिए नीति आयोग के तत्वावधान में अशोक दलवाई समिति का गठन किया गया,जिसने कृषि आय को दोगुना करने के लिए कृषि विकास दर को 12% तक पहुँचाने की सिफारिश की।परंतु कृषि विकास दर अब भी 2 से 2.1% के बीच ही है।ऐसे में अब इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य से भी हम लोगों की दूरी में लगातार वृद्धि हो रही है।

समाधान क्या है? 

सरकार ने अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए कॉरपोरेट टैक्स में कटौती की थी।इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक ने कई बार रेपो रेट में कटौती कर ब्याज दरों को घटाया।लेकिन इन प्रयासों का कोई विशेष परिणाम नहीं दिख रहा है।अर्थव्यवस्था का वर्तमान संकट मूलतः मांग पक्ष से संबद्ध है।कॉरपोरेट टैक्स में कमी का लाभ मांग पक्ष से संबद्ध न होकर आपूर्ति पक्ष से संबद्ध है।आपूर्ति पक्ष में पहले ही समस्या नहीं है।उपभोक्ता के क्रय क्षमता में कमी के कारण मांग में कमी आ रही है।इस कारण कंपनियों को उत्पादन में कटौती करनी पड़ रही है।कंपनियों को अगर लंबे समय तक यह कटौती करनी होगी,तो उन्हें अपने कर्मचारियों की छंटनी भी करनी होगी।सवाल यह है कि इस समस्या का समाधान क्या है? इसके लिए सबसे आवश्यक है कि सरकार सबसे निम्न वर्ग के क्रय क्षमता में वृद्धि करे।उदाहरण के लिए सरकार इस समय किसानों को "प्रधानमंत्री किसान सम्मेलन निधि" के अंतर्गत सीधे रूपये दे रही है।इस तरह के योजनाओं और लाभार्थियों की संख्या में वृद्धि करने की आवश्यकता है।इसी तरह सरकार को आधारभूत संरचना पर भी खर्च में वृद्धि करनी होगी।इससे एक ओर आधारभूत संरचनाओं का निर्माण भी होगा,वहीं लोगों को भारी मात्रा में रोजगार भी मिलेगा। अभी इस समय राष्ट्रीय राजमार्ग विकास प्राधिकरण लगभग 1 लाख 75 हजार करोड़ रूपये के कर्ज में डूबा है।ऐसे में सरकार को इस पर पुन: ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है।

अगर हम लोग निवेश में विकास दर को देखें,तो वह गिरकर 1 प्रतिशत पर आ गई है।इसका मतलब है कि निवेश लगभग नहीं के बराबर हो रहा है।जब अर्थव्यवस्था में माँग बनी रहती है,तभी निवेश भी सुगमता से उपलब्ध हो पाता है।अभी निवेश वृद्धि दर 19 तिमाही के निचले स्तर पर है।जब अर्थव्यवस्था में निवेश नहीं बढ़ेगा,तब तक नौकरियाँ कहाँ से पैदा होगी।जब तक नौकरियाँ पैदा नहीं होगी,तब तक लोगों के आय में वृद्धि नहीं होगी।जब तक लोगों के आय में वृद्धि नहीं होगी,तब तक लोग खर्च नहीं करेंगे।जब लोग खर्च नहीं करेंगे,तो निजी खपत कैसे बढ़ेगी।यह सब कुछ एक -दूसरे से जुड़ा हुआ है।सरकार को इस मामले को गंभीरतापूर्वक लेना चाहिए।मंदी की तकनीकी परिभाषा और रिसेशन या स्लो डाउन के शब्दजाल में उलझने के बजाए निचले स्तर के उपभोक्ताओं के क्रय क्षमता को युद्धस्तर पर बढ़ाने में अपनी ऊर्जा लगा देनी चाहिए।सरकार को अब अपना संपूर्ण ध्यान माँग पक्ष पर केंद्रित करने की आवश्यकता है।
लेखक परिचय - वर्ष 2002 से राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय मामलों पर सतत लेखन। आर्थिक मामलों पर भी मैं लंबे समय से लेखन कर रहा हूँ।

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