संविधान को पहली बार प्रिंट करने वाली दो मशीनें बेच दी गई कबाड़ के भाव

संविधान को पहली बार प्रिंट करने वाली दो मशीनें बेच दी गई कबाड़ के भाव


आज 26 जनवरी 2020 को 71वां गणतंत्र दिवस बड़े धूमधाम से मनाया गया। लेकिन,क्या आप जानते हैं की भारत के संविधान की पहली प्रति जिन दो मशीनों से छापी गई थी, उसे बेच दिया गया और वो भी कबाड़ के भाव में। हिंदुस्तान टाईम की रिपोर्ट के अनुसार पहली बार भारत का संविधान प्रिंट करने वाली दो मशीनों को बेच दिया गया है। वो भी कबाड़ के भाव में, मात्र 1.5-1.5 लाख रुपये में बेच दिया गया है। बेचने के पीछे का कारण इनके रख-रखाव में आया अधिक खर्च बताया जा रहा है। सॉव्रिन और मोनार्क नाम की इन दो मशीनों को ब्रिटेन की कंपनी कैबट्री एंड संस ने बनाया था, जो अब पुरानी हो गई हैं। मशीनों के रख-रखाव में काफी ज्यादा खर्चा आ रहा था। इसलिए इन्हें बेचने का फैसला किया गया है। 

पहली बार संविधान की छ्पाई कब और कैसे हुई 

9 दिसंबर 1946 दिन सोमवार को भारतीय संविधान को लिखने के लिए चर्चा शुरु हुई और इसी दिन पहली बैठक की गई। इसकी अध्यक्षता कर रहे थे डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद। इसके बाद से संविधान के बारे में लिखने की बात शुरु हो गई और आखिरकार इसे नवंबर 26, 1949 को बनाकर तैयार कर लिया गया। इस दिन को याद रखने के लिए हमने 26 नवंबर को संविधान दिवस के रुप में मनाया जाता है। लेकिन, भारत के सामने समस्या ये थी कि संविधान बनकर तैयार तो हो गया है, अब इसे लिखेगा कौन? 

प्रेम बिहारी नारायण रायज़ादा ने जवाहर लाल नेहरु के कहने पर हाथों से भारत का संविधान अंग्रेजी में लिखा और फिर वसंत कृष्ण वैद्य ने हिंदी में अनुवाद किया था। संविधान की किताब में केवल टेक्स्ट दिख रहा था। शांतिनिकेतन के प्रोफेसर नंदलाल बोस और उनके स्टूडेंट्स ने संविधान की कॉपी पर तस्वीरें उकेरीं। इस तरह संविधान की दो प्रतियां एक हिंदी तो एक अंग्रेजी में तैयार कर ली गईं। फिर 24 जनवरी 1950 को एक बैठक हुई। बैठक में कुल 284 सदस्य जिनमें से 15 महिलाएं थीं। बैठक, संविधान को लागू करने के लिए की गई। सभी ने हस्ताक्षर किए और अंत में 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ। 

देहरादून में स्थित सर्वे ऑफ इंडिया के पास सबसे बड़ा और सुसज्जित कारखाना था।साल 1955 में सॉव्रिन और मोनार्क नाम की इन दो मशीनों से लगभग 1000 कॉपियां प्रिंट की गई थीं। जिस तरह की प्रिटिंग की गई थी उसे लिथोग्राफिक प्रिंटिंग कहते हैं। पानी और तेल का इस्तेमाल कर पत्थर या मेटल की प्लेट के जरिए चिकनी सतह पर प्रिंट किया जाता है। इन दो मशीनों से जो पहली प्रति निकाली गई थी, वह अभी भी नॉर्दर्न प्रिटिंग ग्रुप के ऑफिस में रखी गई है।
वक्त के साथ चलना और आगे बढ़ना ही समझदारी है।

सर्वेयर जनरल ऑफ इंडिया के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल गिरीश कुमार के मुताबिक, इन मशीनों का रख-रखाव काफी महंगा हो गया है। इनकी टेक्नोलॉजी भी काफी पुरानी हो गई है। इसलिए इन्हें तोड़कर कबाड़ के भाव बेच दिया गया है। अब इन मशीनों का इस्तेमाल प्रिंटिंग के लिए नहीं होता है। इसके अलावा आकार में बड़े होने से जगह भी बहुत ज्यादा घेरती हैं। सर्वे ऑफ इंडिया को 252 साल हो गए हैं। इतने लंबे समय में हमारे पास कई ऐतिहासिक विरासतें हैं। हमें इनसे जुड़ाव भी है लेकिन, वक्त के साथ चलना और आगे बढ़ना ही समझदारी है। मशीनों का प्रतिरूप किसी म्यूजियम में रखने पर विचार हो सकता है।

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