...और नरेन्द्र से विवेकानंद नाम हो गया।

swami vivekananda,उर्जांचल टाईगर,


डॉ. राजेश कुमार शर्मा"पुरोहित"

भारतीय दर्शन के उद्धारक जिनका मूल मंत्र था उठो जागो और तब तक नहीं रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त न हो।आधुनिक वेदांत ,राजयोग को देश व दुनिया को समझाने वाले जिन्होंने विश्व धर्म महासभा में सनातन धर्म का प्रतिनिधित्व किया। वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु स्वामी विवेकानंद जी का हम सब युवा दिवस के रूप में 12 जनवरी को जन्म दिवस मनाते हैं।अध्यात्म विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा। ये विचार कहे थे स्वामी विवेकानंद जी ने।विवेकानंद जी अनगिनत युवाओं के आदर्श हैं। उन्होंने युवाओं में राष्ट्रभाव जगाने का काम किया था। 

स्वामी विवेकानद जी का जन्म 12 जनवरी 1863 को हुआ।बचपन मे उन्हें नरेन्द्र कहते थे। उनके पिता विश्वनाथ दत्त जी पश्चिमी विचारधारा के थे। वे नरेन्द्र को भी अंग्रेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता सिखाने के पक्षधर थे। बचपन से ही तीव्र बुद्धि का था बालक नरेन्द्र। ईश्वर को देखना चाहता था नरेन्द्र। ईश्वर को पाने के लिए वे ब्रह्मसमाज गए परन्तु वहाँ उनका मन नहीं लगा। पिता का 1884 में निधन हो गया। घर परिवार का सारा काम नरेन्द्र ने संभाला जो बड़ा कठिन था। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। उस समय नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। इतनी गरीबी में भी नरेंद्र अतिथि सेवा करते। वे स्वयं बरसात में भींग जाते ठिठुरते रहते पर अतिथि को तो वे बिस्तर पर सुलाते भोजन कराते सेवा करते। 
जब उन्होंने रामकृष्ण परमहंस का नाम सुना तो वे उनसे तर्क करने के लिए गए। परमहंस जी ने उनको देखा तो उन्हें पहचान गए। उन्होंने सोचा ये वही शिष्य है जिसकी उन्हें लम्बे समय से प्रतीक्षा थी। गुरु की कृपा से इन्हें आत्म साक्षात्कार हुआ और परमहंस जी के सभी शिष्यों में ये अग्रणी हो गए। जब इन्होंने सन्यास लिया और नरेन्द्र से विवेकानंद नाम हो गया। ये सम्पूर्ण जीवन परमहंस जी को समर्पित कर चुके थे। 
जब परमहंस जी ने शरीर का त्याग किया उस समय भी विवेकानन्द ने अपने घर परिवार का ख्याल किये बिना गुरु सेवा में हर समय तैयार रहे खूब सेवा की। परमहंस जी को कैंसर था। जिसके कारण थूंक रक्त कफ वे स्वयं साफ करते थे। गुरु के प्रति अनन्य भक्ति और निष्ठा उनमें कूट कूट कर भरी थी। 

विवेकानंद जी ने पच्चीस वर्ष की आयु में गेरुआ परिधान धारण कर लिया था। उसके बाद उन्होंने युवा सन्यासी के रूप में पैदल चलकर भारत भ्रमण किया। 1893 में शिकागो अमेरिका में जब विश्व धर्म संसद का आयोजन हो रहा था। उस आयोजन में स्वामी जी भारत का करने के लिए उसमे पहुँचे। यूरोप अमेरिका के लोग उस समय भारत जैसे देश क गुलाम लोगो को हीन दृष्टि से देखते थे। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से स्वामी विवेकानद जी को विश्व धर्म परिषद में बोलने का थोड़ा समय मिला। किन्तु उनके विचार सुनकर वहाँ सभी लोग विसिमत हो गए। अमेरिका यूरोप के लोग काफी प्रभावित हुए। अमेरिका में उनका बहुत स्वागत मान सम्मान हुआ। वहाँ इनके भक्त लोगों ने अलग समुदाय बना लिया।। तीन वर्षों तक स्वामी जी अमेरिका ही रहे। उन्होंने वहाँ के लोगो को भारतीय तत्वज्ञान की अलौकिक ज्योति के आलोक में सरोबार करते रहे। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित की।अनेक अमेरिकन विद्यार्थी उनके शिष्य बने। 

वे सदा अपने को गरीबो का सेवक कहा करते थे।भारत की सभ्यता व संस्कृति को विश्व भर में पहुंचाने का कार्य स्वामी विवेकानन्द ने किया। 

उन्होंने शिकागो में अपने संबोधन में कहा था मेरे अमेरिकी भाइयो बहिनो। जिसे सुनकर वहाँ सब लोग प्रभावित हुए और अनगिनत अमेरिकी उनके शिष्य बन गए कलकत्ता के एक कुलीन बंगाली कायस्थ परिवार में जन्मे विवेकानद ने सम्पूर्ण अध्यात्म को समझा। उन्होंने अपने गुरु से सीखा की सारे जीवो में स्वयं परमात्मा का ही अस्तित्व है। ब्रिटिश भारत मे मौजूदा स्थितियों का जायजा लेने के लिए स्वामी जी ने भारतीय उपमहादीप का दौरा किया। 

उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका,इंग्लैंड ,यूरोप में भारत के अध्यात्म संस्कृति व सभ्यता को दुनिया के सामने रखा। विद्यार्थियों के लिए उन्होंने कहा कि पढ़ने के लिए जरूरी है एकाग्रता और एकाग्रता के लिए जरूरी है ध्यान। इसलिए सभी विद्यार्थी ध्यान करना सीखें। ज्ञान स्वयं में वर्तमान है मनुष्य केवल उनका आविष्कार करता है। 
आइये स्वामी जी के बताए मार्ग पर चलें। देश विकास में आगे आएं। 
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