दिल्ली चुनाव : भाजपा से ज्यादा कॉंग्रेस को मंथन की जरूरत !

ABDUL RASHID,अब्दुल रशीद



अब्दुल रशीद
दिल्ली के चुनाव का परिणाम भारत के लिए राजनैतिक तौर पर महत्वपूर्ण हैं। इस चुनाव में जहां एक ओर भारतीय वोटरों ने नफरत की राजनीति को पूरी तरह से अनसुना करते हुए नकार दिया,तो दूसरी ओर विकास कार्यों की जमीनी हक़ीक़त पर मुहर लगाते हुए राजनीति में काम के नाम पर वोट की धारणा को और मजबूत कर दिया है।
दिल्ली का चुनाव एक आम चुनाव था। ऐसा इसलिए क्योंकि दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा हासिल नहीं है, या यूं कहें ग्लॉरिफायड म्यूनिसिपैलिटी है। लेकिन भाजपा ने इस आम चुनाव को अपने लिए रेफेरेंडम बना दिया। नागरिकता कानून(CAA) के बाद ये पहला चुनाव था। रेफेरेंडम ये था कि CAA पर वोटर का ठप्पा लग जाए, और यह तय हो जाय कौन देशभक्त और कौन गद्दार! शाहीन बाग़ को करंट लग जाय! यानी सत्ता के लिए ध्रुवीकरण हर कीमत पर। दिल्ली दिलवालों की है लेकिन भाईचारा,गंगा-जमुनी तहज़ीब की मिठास को कड़वा करने वालों के लिए बेदिल भी है,और बेमुरव्वत भी। सबक देना भी जानती है और आईना दिखाना भी। दिल्ली के भारतीय वोटरों ने भाजपा की ध्रुवीकरण की राजनीति को पूरी तरह रिजेक्ट करते हुए केजरीवाल के विकास पर मुहर लगा दिया है। 

इस सच को भी झुठलाया नहीं जा सकता की  विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव लड़ने का भाजपा का रणनीति बिलकुल अलग होता है।इसलिए दिल्ली के नतीजों से ऐसा कोई मतलब निकालना कि, इससे PM मोदी की लोकप्रियता या भाजपा के केंद्रीय राजनीति पर कोई असर होगा,तो यह पूरी तरह गलत होगा। हां आने वाले बाकी राज्यों का चुनाव प्रभावित जरूर होगा।

यह भी सच है कि लोकसभा में पूरी तरह से मोदीमय होने वाली जनता को विधानसभा में मोदी जी का करिश्माई व्यक्तित्व प्रभावित नहीं करता है। यह बात भाजपा और RSS को भी समझ आ रहा है। दिल्ली नतीजों के एक दिन पहले भैय्या जी जोशी ने जो कहा है,उसकी चर्चा बुद्धिजीवियों और राजनीति गलियारों में खूब है। उन्होंने कहा की हिंदू और भाजपा एक दूसरे के पर्याय नहीं हैं। भाजपा का विरोध हिंदुओं का विरोध नहीं है। इस बयान का मतलब राज्यों की राजनीति में क्या एक नई लकीर खीचना तो नहीं?

650 से ज्यादा पब्लिक मीटिंग, रोड शो, अमित शाह के 52, जेपी नड्डा के 41, राजनाथ सिंह के12, पीएम मोदी के 2 और योगी आदित्यनाथ के 2 रैलियां । देशभर के भाजपा के कद्दावर नेता डोर टू डोर कैम्पेन के लिए लाए गए। गद्दार,बिरयानी,गोली मारने और चुने हुए मुख्यमंत्री केजरीवाल के लिए अमर्यादित टिप्पणी जैसे बेशुमार बदजुबानियों और तमाम तिकड़मों के बावजूद AAP 62 सीट जीत गई,भाजपा 8 पर और कॉंग्रेस शून्य पर सिमट कर रह गई।

दिल्ली के चुनाव नतीजा में विपक्षी दलों के लिए भी सबक है, कि वे दलगत राजनीति की जगह  मुद्दों की राजनीति करें और विकास की वैकल्पिक मॉडल पेश करें। विरासत वाली राजनीति का दौर अपने अंतिम दौर से गुजर रहा है।कांग्रेस को मंथन करना होगा की,राष्ट्रीय राजनीति में अपना जगह कायम रखने के लिए, युवा राजनीति की बात करने की जगह युवाओं को राजनीति में लाना होगा। और ज़िम्मेदारी भी देना होगा। नहीं तो दिल्ली की तरह पूरे भारत में उसका अस्तित्व शून्य  होगा इससे इंकार नहीं किया जा सकता!
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