National Science Day : राष्ट्रीय विज्ञान दिवस एवं भारतीय महिला वैज्ञानिक

National Science Day and Indian Women Scientists


डॉ रामेश्वर मिश्र
आज से 92 वर्ष पूर्व 28 फरवरी का वह दिन जब भारत ने विज्ञान के क्षेत्र में अपने बौद्धिक ज्ञान से सबको हतप्रभ कर दिया था, यह वह दिन था जब प्रसिद्द वैज्ञानिक चंद्रशेखर वेंकटरमन द्वारा विज्ञान के क्षेत्र में एक बड़ी खोज के माध्यम से सारे विश्व को अपने ओर देखने को विवश कर दिया था, तब से आज तक चंद्रशेखर वेंकटरमन की खोज को रमन प्रभाव के नाम से जाना जाता है जिसके लिए उन्हें सन 1930 में विज्ञान का नोबेल पुरस्कार मिला जिससे भारत का गौरव विश्व के पटल पर रेखांकित हुआ। आज से 33 वर्ष पूर्व भारतीय सरकार द्वारा रमन प्रभाव के प्रति समर्पण दिखाते हुए 28 फरवरी को विज्ञान दिवस के रूप में मनाने का निर्णय लिया गया। विज्ञान दिवस को सन 1999 से एक विशेष लक्ष्य के रूप में मनाया जाने लगा और हर वर्ष इस दिन के लिए एक विशेष विषय का चयन किया जाता है। हर वर्ष का विषय अलग अलग होता है जैसे वर्ष 2019 के विज्ञान दिवस का विषय था 'लोगों के लिए विज्ञान और विज्ञान के लिए लोग', संयोगवश इस वर्ष का विषय ‘विज्ञान में महिलाऐं’ हैं।
विज्ञान में महिलाओं का उल्लेख करने पर प्रसिद्द महिला वैज्ञानिकों का राष्ट्र की लिए किया गया योगदान हमारे सामने आ खड़ा होता है जो भारत के विज्ञान के क्षेत्र में सतत विकास को रेखांकित करता है जिससे हमारा अतीत गौरवान्वित है साथ ही साथ हमारी पूर्वाग्रह की भावनाओं पर भी विराम लग जाता है कि महिलाऐं पुरुषों के मुकाबले कमतर हैं। विज्ञान दिवस के अवसर पर कुछ प्रमुख महिला वैज्ञानिकों के योगदान का उल्लेख कर उनके प्रति अपने समर्पण के भाव को व्यक्त कर सकतें हैं। इनके सफल परिश्रम से हमारा देश प्रगति पथ पर अग्रसर होता चला गया। कुछ प्रमुख महिला वैज्ञानिक जिनमे अनंदीबाई जोशी उन्नीशवीं सदी की प्रमुख महिला वैज्ञानिक थीं। 19 वर्ष की अवस्था में इन्होनें अपना प्रशिक्षण प्रारंभ किया और इन्हें भारत की प्रथम महिला डॉक्टर होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उनके शोध का विषय आर्यन हिन्दुओं के बीच प्रसूति था। यह भारत का दुर्भाग्य ही था कि 22 वर्ष की अल्प आयु में उनका देहान्त हो गया। प्रो. अशीमा चटर्जी एक प्रमुख महिला रसायन शास्त्री थीं और उन्होंने जैव विज्ञान एवं फाइटो मेडिसिन के क्षेत्र में कार्य किया। उनका महत्वपूर्ण प्रयास विन्सा एल्का लोडस पर शोध था। उन्होंने मर्ज़िलेंटरोधी तथा मलेरिया रोधी औषधि का विकास किया। उनके कार्यों के फलस्वरूप उन्हें अनेक फेलोशिप और सम्मान प्राप्त हुए, सन 1974 में उन्हें पद्म भूषण सम्मान से भी नवाजा गया। प्रो. अशीमा चटर्जी किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टर ऑफ़ साइंस की उपाधि प्राप्त करने वाली पहली भारतीय महिला थीं। प्रो. इन्द्रा नाथ प्रसिद्ध महिला प्रतिरक्षा वैज्ञानिक हैं, इन्होंने भारत में विज्ञान के क्षेत्र में सराहनीय कार्य किया। प्रो. इन्द्रा नाथ भारत की अग्रणी महिला वैज्ञानिक और कुष्ठ रोग की अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जमीनी विशेषज्ञ हैं। इन्द्रा नाथ ने लेप्राब्लू हैदराबाद में पीटर रिसर्च सेंटर के निर्देशक के रूप में कुष्ठ रोग के खिलाफ भारत की लड़ाई में सक्रिय योगदान दिया। प्रो. इन्द्रा नाथ की खोज, ‘कुष्ठ रोग के उपचार एवं टीकों के विकास’ में एक सार्थक कदम था। सन 1999 में उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री सम्मान से नवाजा गया। प्रो. अर्चना शर्मा भारत की अग्रणी महिला वैज्ञानिक हैं जिन्होंने जिनोवा में विश्व के सबसे बड़े प्रयोगशाला सर्न में स्टाफ फिसिस्ट के रूप में कार्य किया है। सर्न की प्रयोगशाला ने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्यों से पर्दा उठाने में सफलता प्राप्त की है। अर्चना शर्मा को भारत सरकार द्वारा सन 1984 में पद्म भूषण सम्मान से नवाजा गया। अदिति पन्त एक समुद्र वैज्ञानिक हैं और अंटार्कटिका की यात्रा करने वाली पहली भारतीय महिला हैं। इन्होंने भू-विज्ञान एवं समुद्र विज्ञान में सराहनीय कार्य किया है। इंदिरा हिंदुजा मुंबई के बाहर स्थित एक भारतीय स्त्री रोग एवं बांझपन विशेषज्ञ है। भारत में टेस्ट-टूयब बेबी की तकनीक देने वाली पहली महिला वैज्ञानिक हैं। इंदिरा हिंदुजा को समय से पहले डिम्ब ग्रंथि विफलता और रजोनिवृत्ति के रोगियों के लिए ‘गैमेत इंट्राफैलोपियन ट्रांसफर’ (गिफ्ट) तकनीक के लिए जाना जाता है। सुनेत्रा गुप्ता एक प्रसिद्ध महिला वैज्ञानिक हैं। इनको संक्रामक एजेंटों के अध्ययन करने का जुनून है जो एन्फ्लूएंजा और मलेरिया जैसी बिमारियों का कारण बनते हैं। इन सब महिलाओं के अतिरिक्त अन्य महिला वैज्ञानिकों ने भी अपने कार्यों से हमारे देश का सम्मान बढ़ाया है जिसमे मंगलामणि जिन्होंने अंटार्कटिका महाद्वीप में एक महिला वैज्ञानिक के रूप में सबसे अधिक 403 दिन रहने का कीर्तिमान बनाया है। चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर रितु करिधल जिन्हें राकेट वूमेन भी कहा जाता है, के साथ प्रोजेक्ट डायरेक्टर एम बनिता ने कार्य किया है। इससे पहले रितु करिधल ने मंगलयान मिशन में आठ सदस्यों वाली महिला समिति में भी कार्य किया था। इसके साथ ही साथ नंदिनी हरिनाथ, एन. बलिरामथी, मौमितादत्ता, मीनल सपंथ, यमुना कृष्णन, शुभातोले, प्रेरणा शर्मा, नीना गुप्ता आदि प्रमुख भारतीय महिला वैज्ञानिक हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी में महिलाओं की सहभागिता बढ़ाने के लिए वर्ष 2014 में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने बड़ा कदम उठाते हुए महिला केंद्रित योजनाओं को ‘किरण’ नामक योजना में समाहित कर दिया। विज्ञान प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने महिला विश्वविद्यालयों में नवाचार एवं उत्कृष्ठ अनुसंधान कार्यों के लिए ‘क्योरी योजना’ चलाई है जिसे आठ महिला विश्वविद्यालयों में लागू किया गया है। क्यूरी योजना के तहत दस हजार महिलाओं को गुणवत्ता नियंत्रण, उद्योगिकी, सूक्ष्म जीव विज्ञान, पौध औषधि, मशरूम और बांस की खेती आदि में कौशल प्रशिक्षण दिया जा रहा है। सन 2015 में महिलाओं को विज्ञान, सूचना, प्रौद्योगिकी में उत्कृष्ठ योगदान के लिए रानी लक्ष्मीबाई नारी शक्ति पुरस्कार योजना प्रारम्भ की गयी है। 

इन सब सरकारी प्रयासों के बाद भी भारत के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं का श्रमिक योगदान बहुत कम है। 2014 से 2016 के बीच सूचना और संचार टेक्नोलॉजी में महिलाओं का योगदान तीन प्रतिशत है जबकि विज्ञान, गणित और सांख्यिकी में यह आंकड़ा सिर्फ पाँच प्रतिशत है। महिलाओं की विज्ञान में हिस्सेदारी के क्रम में 69 देशों की सूची में भारत सबसे निचले पायदान पर है। इन सब साक्ष्यों का सम्पूर्ण अवलोकन जहाँ हमें महिला वैज्ञानिकों के श्रेष्ठ कार्यों से अवगत कराने में सक्षम है तो दूसरी ओर विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की घटती सहभागिता हमें विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में महिलाओं को जोड़ने के लिए नई अनिवार्यता पर बल देती है।
लेबल:
प्रतिक्रियाएँ:

एक टिप्पणी भेजें

MKRdezign

संपर्क फ़ॉर्म

नाम

ईमेल *

संदेश *

Blogger द्वारा संचालित.
Javascript DisablePlease Enable Javascript To See All Widget