दलबदल कानून और स्पीकर की भूमिका पर संसद करे फिर से विचार

दलबदल कानून और स्पीकर की भूमिका पर संसद करे फिर से विचार


अब्दुल रशीद
मध्यप्रदेश के सियासी उठापटक के बीच दलबदल कानून और स्पीकर की भूमिका को लेकर चर्चा शुरू है। दरअसल, दलबदल को रोकने के लिए पिछले चार-पांच दशक में कई कानून बने और कई तरह के उपाय किए गए। लेकिन हर बार राजनैतिक पार्टियों और नेताओं ने कोई न कोई रास्ता ढूंढ ही लिया। तमाम उपाय और बदलाव के बाद अब विधायकों,सांसदों के इस्तीफे का रास्ता निकाला गया है। शायद कानून में बदलाव करते समय ऐसा किसी ने सोचा भी न था कि दलबदल करने के लिए जीते हुए जन प्रतिनिधि अपनी सीट से इस्तीफा देकर उसी सीट पर दोबारा चुनाव लड़ने को तैयार हो जाएंगे। आमतौर पर जीते हुए प्रतिनिधि इस्तीफा देने से डरते हैं। कर्नाटक से लेकर मध्य प्रदेश और गुजरात में जिस थोक भाव से विधायक इस्तीफा दे रहे हैं उससे मौजूदा कानून में बदलाव नहीं किया गया तो सत्ता जनता के मतदान के बजाय थैलीशाहों की कठपुतली बन कर रह जाएगा।
बिहार में लालू प्रसाद ने एक बार अपनी पार्टी की राज्य सरकार में 90 मंत्री बना दिए थे और कहा था कि वे भूतपूर्व न हो जाएं, इसलिए अभूतपूर्व मंत्रिमंडल बना दिया है। उस समय पार्टियां मंत्री पद के लालच में दलबदल कराती थी। ऐसी समस्या को देखते हुए 2003 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने दलबदल कानून में 91वें संविधान संशोधन के सहारे ऐसा बदलाव किया, जिससे पार्टी में टूट-फूट और विलय की प्रक्रिया रूक जाए।चुने हुए प्रतिनिधियों के दलबदल करने के लिए दो-तिहाई की सीमा तय की गई। मंत्रियों की भी सीमा तय कर दी गई। लोकसभा और विधानसभा के सदस्यों की संख्या के 15 फीसदी से ज्यादा मंत्री नहीं बनाने का प्रावधान किया गया।और पार्टी के दो-तिहाई सदस्य एक साथ अलग होते हैं तभी पार्टी में विभाजन हुआ माना जाएगा। 

कहा जाता है राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता है जिस अटल बिहारी वाजपेयी ने दलबदल का रास्ता बंद किया उन्हीं की पार्टी ने उनके जीवनकाल में ही एक नया रास्ता खोल दिया। उनकी पार्टी के एक मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा ने 2008 में अपने यहां ‘ऑपरेशन कमल’ शुरू किया, जिसके तहत उन्हें राज्य में कांग्रेस और जेडीएस से चुने हुए विधायकों का इस्तीफ़ा कराया और उनकी सीटों पर उपचुनाव करा कर उनको भाजपा की टिकट से चुनाव जिताया। और येदियुरप्पा ने अपनी अल्पमत सरकार के लिए बहुमत हासिल किया था। पिछले साल उन्होंने इसी फार्मूले के तहत राज्य की जेडीएस-कांग्रेस सरकार को गिराया और अपनी सरकार बनाई। अब इसी फार्मूले के तहत भारतीय जनता पार्टी मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरा कर अपनी सरकार बनाने के काम में जुटी हुई है।

मध्यप्रदेश में जहां एक राज्यसभा की सीट न देना कांग्रेस की सरकार के लिए मुसीबत बना वहीं गुजरात में 26 मार्च को राज्य सभा की चार सीटों के लिए होने वाले चुनाव में दो की जगह एक राज्यसभा सीट से संतोष करना पड़ेगा। 182 सदस्यों की गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के पास 73 विधायक थे जिनकी बदौलत पार्टी को दो सीटें जीतने की उम्मीद थी। लेकिन चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस के पांच विधायकों ने इस्तीफा दे दिया है और अब कांग्रेस को लग रहा है कि वो एक से ज्यादा सीट नहीं जीत पाएगी। 

स्पीकर को सांसदों या विधायकों की अयोग्यता पर फैसला लेने का अधिकार है लेकिन इस अधिकार का भी दुरुपयोग अनेक जगहों पर देखने को मिला। पिछले साल कर्नाटक में विधानसभा अध्यक्ष ने 17 विधायकों का इस्तीफा मंजूर करने की बजाय उन्हें अयोग्य घोषित करने का फैसला सुनाया था। स्पीकर जो कि खुद किसी पार्टी से जुड़े होते हैं और उसके सदस्य होते हैं,ऐसे में उनके फैसले पूरी तरह से निष्पक्ष होंगे, ऐसा यक़ीन करना बेहद मुश्किल है।हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने बीच का रास्ता निकाला और विधायकों को उपचुनाव लड़ने की मंजूरी दी। लेकिन क्या इससे समस्या का निदान हो जाएगा,शायद नहीं? 

मौजूदा परिस्थितियों के मद्देनजर इस कानून को बदल कर पहले से कठोर प्रावधान करने का समय आ गया है। जब कोई व्यक्ति दल-बदल करे तो उसे निश्चित अवधि तक मंत्रीपद न मिलने संबंधी कानून बनाना चाहिए। अगर कोई सांसद या विधायक जिस पार्टी से चुना गया है और उसे छोड़ता है तो उस सदन के कार्यकाल में उसके फिर से चुनाव लड़ने पर रोक लगनी चाहिए।दलबदल के संबंध में स्पीकर के निर्णय लेने की शक्ति की समीक्षा होनी चाहिए।
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