...तुम्हें याद हो, के न याद हो

...तुम्हें याद हो, के न याद हो


सग़ीर ए ख़ाकसार

दूरदर्शन पर फिर से रामायण,महाभारत,और शाहरुख खान के सर्कस फिर से प्रसारण दूरदर्शन पर शुरू हो गया है।अपने समय के बेहद लोकप्रिय धारावाहिकों ने बीते दिनों की याद एक बार फिर से दिला दी है।आइये, आप को हम ले चलते हैं फ्लैशबैक में करीब दो दशक पूर्व।उस वक़्त आने वाले सभी धारावाहिकों की याद आना स्वाभाविक है।रामायण और महाभारत उस वक्त खासे लोक प्रिय थे।उस समय हर घर में टीवी सेट नहीं होते थे।पूरे मोहल्ले के लोग किसी एक घर मे एकत्र होकर कार्यकमों का लुत्फ उठाते थे।रामायण और महाभारत जैसे कार्यक्रमों का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोलता था।

इन कार्यक्रमों के प्रसारण के समय करीब 1987 -1988 में तो सड़के ऐसे ही वीरान हो जाती थीं जैसे आज कोरोना के समय लॉक डाउन की वजह से है।महाभारत का चर्चित संवाद"मैं समय हूँ.... याद आ गया।रामायण का प्रसारण उस वक्त ब्रिटेन में बीबीसी पर भी किया गया था ।जहां दर्शोकों कि संख्या का आंकड़ा 50 लाख के पार चला गया था।दोपहर में प्रसारित होने वाले किसी भो धारवाहिक की यह सबसे बड़ी दर्शक संख्या थी।विक्रम बेताल (1985)महाकवि सोमदेव की लिखित बेताल पचीसी पर आधारित कहानियां काफी ज्ञान वर्धक और रोमांच पैदा करने वाली थी।चंद्रकांता धारवाहिक (1994) में जब नौगढ़ और विजय गढ़ का नाम आता था तब हम नौगढ़ को अपना गृह जनपद सिद्धार्थ नगर जिसका नाम नौगढ़ भो था ,समंझ लेते थे।देवकीनन्दन खत्री के उपन्यास पर आधारित यह धारवाहिक तब खूब पसंद किया गया।"चंद्रकांता की कहानी ये माना है कि पुरानी, ये पुरानी होकर भी लगती बड़ी है सुहानी"की धुन आज भी कानो में गूंजती है।इस धारवाहिक में कुरुर सिंह का किरदार बहुत ही ज़ोरदार था।इसी तरह "द स्वोर्ड ऑफ टीपू सुल्तान"को भला कैसे भुला जासकता है।अंग्रेज़ी हुकूमत को मात देने वाले शेर ए मैसूर टीपू सुलतान की याद आज भी दिलो दिमाग मे तरो ताज़ा है।टीपू सुल्तान ने कहा था कि "गीदड़ की सौ साल की ज़िंदगी से अच्छा है शेर की एक दिन की ज़िंदगी"।इसके अलावा बच्चो का पहला सुपरमैन "शक्तिमान","हम लोग" "माल गुड़ी डेज" और अप्पू और पप्पू भी खूब पसंद किया गया।जंगल बुक का वह संगीत "जंगल जंगल बात चली है पता चला है,चड्ढी पहन कर फूल खिला है आज भी प्यारा लगता है और बचपन की याद दिलाता है।इन सब धारावाहिको के बीच डॉ चंद्र प्रकाश दिवेदी के" चाणक्य "की चर्चा न हो तो बात अधूरी रहेगी।डॉ चंद्र प्रकाश ने चाणक्य में बहुत ज़ोरदार अभिनय किया था वो खुद निर्माता ,लेखक थे और अभिनय बहुत शानदार किया था।डॉ चंद्र प्रकाश की संवाद डिलेवरी काबिले तारीफ थी जिसमें गहरा आक्रोश छुपा होता था।इसके अलावा सर्कस,बुनियाद,आदि तो थे ही,तुम्हे याद हो के ना याद हो।
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