मदद का प्रदर्शन करने वाले को लजाना चाहिए !

The demonstrator of help should be ashamed.


अब्दुल रशीद

डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर, उनके विचार और उनका जीवन मौजूदा समय में जब पूरी दुनिया कोरोना वायरस से एक जंग लड़ रही है, तब और भी प्रासंगिक हो जाता है। कारण जिस दलित, ग़रीब, मज़दूर और भूमिहीन किसान के लिए उन्होंने लड़ते हुए पूरा जीवन बिता दिया, वह आज इस कोरोना संकट के दौर में दोहरी मार झेल रहा है। 

ग़रीब मजदूर एक तरफ ख़ुद की और अपने परिवार की भूख मिटाने के इंतज़ाम, काम छिन जाने के बाद उत्पन्न विपरीत परिस्थितियों से जूझ रहा है तो दूसरी तरफ कोरोना को लेकर जारी स्वास्थ्य संबंधी हिदायतों का पालन बगैर स्वास्थ्य सुरक्षा के करने को मजबूर है। अपनी बदहाल स्थिति के चलते ग़रीब और समाज के हाशिए पर मौजूद तबक़ा कोरोना से संक्रमित होने के सबसे बड़े जोख़िम से जूझ रहा है। 

बाबा साहब अक्सर इस तबक़े की रिहायश वाली जगहों, वहां की साफ़-सफ़ाई,हाइजीन के बुरे हालातों,और ग़रीबी के चलते कई तरह की स्वास्थ्य और जीवन संबधी जोखिमों के बारे में लिखते, विचारते और सावधान करते रहते थे। 

भारत के संविधान का आर्टिकल-21 हर एक नागरिक को स्वस्थ और सम्मानपूर्ण जीवन देने का वादा करता है। बिना स्वास्थ्य एवं सम्मानपूर्ण जीवन के हम 'अधूरी नागरिकता' की स्थिति में जीते हैं। दलित एवं ग़रीब, श्रमिक एवं भूमिहीन तबक़ों की नागरिकता 'स्वास्थ्य सुरक्षा' के बिना अधूरी है। 
प्रवासी मज़दूरों, असंगठित सेक्टर के कर्मचारियों और दिहाड़ी मज़दूरों की एक बड़ी संख्या इस कोरोना वायरस के संक्रमण के लिए बेहद असहाय है और जोख़िम भरे हालात में जीने को मजबूर है। इन लोगों के पास न संक्रमण से बचने की सलाह पहुंच रही है और मास्क, सैनेटाइज़र, साबुन, जैसे साधन तो बहुत दूर की बात एक वक्त का भोजन भी मयस्सर नहीं हो पा रहा है। 
डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर ने दलितों और ग़रीबों को एक सम्मानित जीवन देने की लड़ाई लड़ी उनके इस लड़ाई से इन वर्गों को लाभ भी मिला, लेकिन इस लॉकडाउन की स्थिति में उनकी 'मानवीय देह' मात्र एक 'बायोलॉजिकल देह' में बदल गई है। उनके (गरीब मजदूर) देह का मानवीय सम्मान इस संकट की स्थिति में ख़त्म होते देखा जा सकता है। वे पैदल, भूखे 400-500 किलोमीटर की यात्रा करने को मजबूर हैं। उन्हें कई जगह प्रशासन द्वारा अत्यंत छोटी जगह में एक साथ लोहे के गेट में बंद कर दिया गया,घुटने के बल चला कर तमाशा भी बनाया गया। 

कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए जब सरकार ने लॉकडाउन का एलान किया तो बड़ी तादाद में ऐसा बेहद ग़रीब, शहरी मज़दूर तबक़ा बेरोज़गार हो गया। इनकी भूख उन्हें लीलने को बेताब हो उठी और कोरोना संक्रमण इन्हें अपना शिकार बनाने के लिए मचलने लगा। 

जो गांव 1950 के पहले डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर के शब्दों में 'दलितों के लिए दमन की भूमि, अज्ञानता और अंधी स्थानीयता' का क्षेत्र था, आज वही इन प्रवासी मज़दूरों, जिनमें अधिकांशतः दलित और ग़रीब हैं,की शरणस्थली बन रहा है। 

आज लॉकडाउन के कारण उन्हें पुनः विस्थापन का दर्द झेलना पड़ रहा है। ये लोग अपने मूल गांवों की तरफ़ लौटने को मजबूर हैं।कुछ मामलो को छोड़ दें तो इन गांवों में सरकार के निर्देशों के मुताबिक़ क्वारंटीन में रहने के बाद वे अपने घरों में लौट रहे हैं। 

लॉकडाउन में डॉ॰ बाबासाहब आम्बेडकर  के जन्मदिन पर बड़े आयोजन नहीं हो पाए, लेकिन कम से कम बाबा साहब के जन्म दिन पर एक वक्त की रोटी देकर,अपने स्वार्थ के लिए फोटो खिचवाने वाले ढोंगी मसीहाओं को लजाना चाहिए कि,गरीब मजदूर मौजूदा परिस्थिति के कारण असहाय और बेबस जरूर हैं लेकिन भिखारी बिलकुल नहीं,ये अपनी रोटी श्रम के दम पर कमाते रहें हैं।
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