हिंदी पत्रकारिता दिवस :"स्वराज" हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है।

तीन सम्पादकीय लिखने पर तीस वर्षों की सजा।


तीन सम्पादकीय लिखने पर तीस वर्षों की सजा।

"स्वराज" इलाहाबाद से निकलने वाला एक उर्दू साप्ताहिक समाचारपत्र था।1907 में उर्दू में निकलने वाला एक ऐसा अखबार था जिसने ढाई साल में ही आठ सम्पादक देखे। इसके सम्पादक जल्द बदलते रहे, क्योंकि अखबार ने अंग्रेजी सरकार के विरुद्ध अपनी कलम की धार कभी भोथरी नहीं होने दी। इसके एवज में सम्पादकों को कालापानी की सजा हो गई। सात सम्पादकों को कुल मिलाकर 94 साल 9 महीने की सजा हुई।काबिलेगौर वाली बात यह है,की उर्दू में छपने वाले ‘स्वराज’ के आठों सम्पादकों में से कोई भी मुसलमान नहीं था जो गंगाजमुनी तहज़ीब की जिंदा मिसाल है।

"हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है'

शांति नारायण भटनागर ने उर्दू के साप्ताहिक अखबार स्वराज को 1907 में दिवाली के दिन से शुरू किए थे। शांति नारायण लाहौर से प्रयागराज आए और 8 पेज के इस अखबार का प्रकाशन शुरू किया। इस अखबार की टैग लाइन "हिंदुस्तान के हम हैं, हिंदुस्तान हमारा है' था। इस दौरान उन्होंने भारत माता सोसायटी बनाई जिसका सालाना चंदा मात्र 4 रुपए था।

स्वदेशी आंदोलन के समय 1907 में उत्तर प्रदेश में इलाहाबाद के निवासी शांति नारायण भटनागर ने अपनी जमीन-जायदाद बेचकर स्वराज नामक साप्ताहिक अखबार निकाला। स्वराज अखबार के सम्पादकों को कुल 125 वर्ष के काले पानी की सजा हुई, फिर भी डिगे नहीं। स्वराज के संस्थापक भटनागर जी 'रायजादा' कहलाते थे उन्हें भी सरकार ने नहीं छोड़ा। तीन वर्षों का सश्रम कारावास हुआ। 

कलेक्टर ने चुनौती दी कि और भी कोई है इस तख्त पर गद्दीनशीन होने के लिये।

स्वराज प्रेस जब्त कर लिया गया। नया प्रेस खुला। बलिदानी सम्पादकों ने फिर कमान संभाल ली। होती लाल वर्मा को 10 वर्ष तथा बाबू राम हरि को 11 अंकों के प्रकाशन के बाद 21 वर्षों की सजा हुयी। मुंशी राम सेवक नये सम्पादक के रूप में कलेक्टर को अपना घोषणा पत्र ही दे रहे थे कि उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। कलेक्टर ने चुनौती दी कि और भी कोई है इस तख्त पर गद्दीनशीन होने के लिये। तब आगे आये देहरादून के नन्द गोपाल चोपड़ा, जिन्हें 12 अंकों के सम्पादन के बाद 30 वर्षों की सजा दी गयी। तब एकदम से 12 नामों की सूची सम्पादक बनने के लिए आयी। सभी ने कहा हम करेंगे सम्पादन। किन्तु पंजाब के फील्ड मार्शल कहे जाने वाले लद्धा राम कपूर सम्पादक बने। उन्हें तीन सम्पादकीय लिखने पर प्रति सम्पादकीय 10 वर्ष अर्थात् कुल तीस वर्षों की सजा हुई। इसके पश्चात अमीर चन्द्र जी इसके सम्पादक बने। 
हर सम्पादक के जेल जाने के बाद स्वराज में एक विज्ञापन छपता था -  सम्पादक चाहिए- वेतन दो सूखे ठिक्कड़ (रोटी), एक गिलास ठंडा पानी, हर सम्पादकीय लिखने पर 10 वर्ष काले पानी की कैद।फिर भी लोग डरे नहीं, दमन के सम्मुख झुके नहीं। 
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