मुसाफिर हूँ यारों,अगर जिंदा रहे तो वापसी जरूर करेंगे...

नीरज त्यागी

अपने मन की जिज्ञासा में आकर मैंने एक बुजुर्ग से पूछा कि क्या घर जाकर खाना पीना मिल जाएगा और इस बीमारी से बच जाओगे।उस बुजुर्ग की आंख में एक आशा दिखाई दी और जुबां पर एक बड़ा ही पॉजिटिव जवाब था।ये तो नहीं पता वहां खाना मिलेगा या इस बीमारी से बचेंगे।लेकिन अपने लोगों के बीच में जाकर कुछ दर्द तो दूर हो जाएंगे।उसकी इस बात से मन निशब्द हो गया।

यहीं से मैंने वापसी आने का फैसला किया।मन में एक दुख यह भी था।इस पूरे रास्ते में कोई भी सरकारी वाहन,बस या टेंपो मुझे उनकी सहायता करता हुआ दिखाई नहीं दिया।मैं इन सभी लोगों को अपने मंजिल की ओर बढ़ता हुआ छोड़कर वापसी अपने घर की तरफ चल पड़ा।

नीरज त्यागी का यह पूरा लेख आप आने वाले अंक में पढ़ेंगे तब तक कीजिए थोड़ा इंतज़ार.... 


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