मानवीय नीचता की प्रकाष्ठा, गर्भवती हथिनी तीन दिन तक तड़पते हुए करती रही मौत का इंतज़ार।

"असहनीय दर्द के कारण गांव की गलियों में भागते समय भी उसने एक भी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया। उसने एक भी घर नहीं रौंदा।”


केरल में पल्लकड़ ज़िले के मन्नारकड़ में विस्फोटक से भरा अनानास खाने की वजह से एक गर्भवती हथिनी की मौत हो गई जिससे पूरे देश में लोग ग़ुस्से में हैं। मौत ने मानवता पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। 

गर्भवती हथिनी को विस्फोटक भरा अनानास खिलना सोशल मिडया पर मानवीय नीचता की पराकाष्ठा बताया जा रहा है। यह दर्दनाक घटना  मानव और जानवरों के बीच संघर्ष में मानवता के पतन की ये एक और कहानी है। 

अनानास में हल्के विस्फोटक पैक करके जानवरों को खेतों में आने से रोकना केरल के स्थानीय इलाक़ों में काफ़ी प्रचलित है।इसे मलयालम में 'पन्नी पड़कम' कहा जाता है जिसका मतलब है ''पिग क्रैकर''। ये विस्फोटक स्थानीय स्तर पर ही बनाई गई सामग्री या त्योहारों में इस्तेमाल होने वाले पटाख़ों से तैयार किया जाता है। 

वाइल्डलाइफ़ एक्सपर्ट्स का मानना है कि विस्फोटक और अलग-अलग तरह के जाल का इस्तेमाल सिर्फ़ केरल में ही नहीं पूरे भारत में किया जाता है। 

यह कोई पहली घटना नहीं ?

क़रीब 18 साल पहले इसी तरह की एक घटना में एक हाथी बुरी तरह घायल हो गया था और उसके मुंह में गंभीर जख़्म आए थे। डॉ. चीरन ने उसका ऑपरेशन किया था। 

उस वक़्त डॉ. चीरन के साथ अनुभवी पशु चिकित्सक प्रो. केसी पणिक्कर और डॉ. पीबी गिरिदास भी थे जिन्होंने हाथी को ट्रैंक्विलाइज़ किया था। 

डॉ. चीरन कहते हैं, ''हम हाथी को बचा नहीं पाए क्योंकि जब ऊपर और नीचे दोनों जबड़े बेहद बुरी तरह जख़्मी हों तो कोई भी जानवर नहीं बच सकता।''

इस तरह विस्फोटक का शिकार हुए हाथियों से जुड़ी आख़िरी घटना अप्रैल में हुई थी जब 8 या 9 साल का एक हाथी कोल्लम ज़िले के पुनालुर फॉरेस्ट डिविजन में पठानपुर के पास विस्फोटक के संपर्क में आया था। 

उसने एक भी घर नहीं रौंदा।

मालापुरम जिले के वन अधिकारी मोहन कृष्णन की सोशल मीडिया पोस्ट के बाद यह मामला सामने आया है। पोस्ट के मुताबिक जंगली हथिनी खाने की तलाश में जंगल से बाहर निकलकर एक गांव में पहुंची। गांव में घूमते समय उसे कुछ स्थानीय लोगों ने पटाखों से भरा अनानास दिया। गर्भवती हथिनी ने अनानास जैसे ही मुंह में डाला, वैसे ही वह फट पड़ा। हथिनी का मुंह और जीभ बुरी तरह झुलस गए।
इसके बाद हथिनी कराहते हुए गांव में इधर उधर भागने लगी। वह ठंडे पानी से अपने मुंह की जलन शांत करने लगी। लेकिन बीते बुधवार को उसने नदी में दम तोड़ दिया। हथिनी की तस्वीर के साथ एक भावुक फेसबुक पोस्ट में वन अधिकारी मोहन कृष्णन ने लिखा, 

"असहनीय दर्द के कारण गांव की गलियों में भागते समय भी उसने एक भी इंसान को नुकसान नहीं पहुंचाया। उसने एक भी घर नहीं रौंदा।”

उसे प्रणाम किया और अंतिम श्रद्धांजलि दी। 

हथिनी को बचाने की कोशिश करने वाले मोहन कृष्णन के मुताबिक दो हाथियों की मदद से उसे नदी से बाहर निकालने की काफी कोशिशें की गईं. लेकिन वह बाहर नहीं आई। 27 मई की शाम चार बजे उसने नदी में खड़े खड़े दम तोड़ दिया।

मोहन कृष्णन ने कहा, "वह सुयोग्य विदाई की हकदार थी। हम उसे एक लॉरी में जंगल के भीतर ले गए।वहां उसे लकड़ियों में लेटाया गया, उस जमीन पर जहां वो खेलते हुए बड़ी हुई। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर ने मुझे बताया कि वह अकेली नहीं थी। मास्क के बावजूद मैं डॉक्टर के दुख को समझ गया। हमने वहीं उसे जला दिया। हमने उसे प्रणाम किया और अंतिम श्रद्धांजलि दी। ”
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